शाश्वत सत्य
शस्त्रों के बल पर जीत होती है आसान
इनके प्रयोग से निश्चित है घातक परिणाम
भारत की भूमि पर संभव कभी हुआ था
शस्त्रों को त्यागकर हुआ कोई महान था।
युद्ध की विभीषिका ने अशोक को हिला दिया
विजय के हर्ष में शोक को मिला दिया
चाहा कुछ और था पाया कुछ और ही आनंद की मदिरा में विष घोल मिला दिया।
कटे हुए नरमुंड इस ओर पड़े थे रक्त से सने धड़ उस और पड़े थे
साँसों की डोर से जो अभी तक जुड़े थे पल में विलग अंग इधर-उधर पड़े थे।
माता की गोद से बालक बिछड़ गया सधवा का भाग्य भी आज उस से रूठ गया
रक्त की नदी में भविष्य सबका बह गया युवा के शव को जब वृद्ध ने कंधा दिया।
कैसा यह लोभी है, कैसा हत्यारा है
धरती के टुकड़ों पर नरसंहार सारा है
रक्त को पी पीकर जिसने प्यास बुझाई है अपनी ही कर्मों से आज वह हारा है।
"अग्नि में तेरी जब देह भस्म होवेगी,
नरक में भी तुझको ना शरण मिल पाएगी" अबला का श्राप सुन सबल थरथर काँप उठा
भय और घृणा से चीत्कार कर रो उठा।
आँखों के आगे नभ लाल-लाल हो गया जीव सहित शरीर कुछ निर्जीव सा हो गया राजा था कल तक वह भिक्षुक-सा हो गया नाम था अशोक किंतु शोकमय हो गया।
यही वह 'संध्या' थी कि पत्थर दिल पिघल गया
शस्त्रों को त्याग कर पुनर्जन्म मिल गया आज का मनुष्य इस घटना को भूल गया मानवता त्याग कर जीते जी मर गया।
पाप की धरती में पुण्य का रोपण किया विश्व के इतिहास में उदाहरण नया दिया 'सुंदर' है 'सत्य' वही जो 'शिवम्' युक्त हो गया
अहिंसा और त्याग को शाश्वत बना दिया।
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