सृजन
सृजन धरती की गोद में दबा था एक बीज निकलने को आतुर किंतु भयभीत। बाहर का संसार न जाने कैसा होगा ? क्या कोई है जो सहारा दे,गा सँभालेगा ? कहीं से आवाज़ आई ‘एक बार प्रयास तो करो, न हो कोई ,,न सही स्वयं ही अपना सम्बल बनो’। बीज को जब अपनी ही बात समझ आई, तो ऑंखे खोलीं और ली अँगड़ाई। बाहर के जगत से हुआ जब साक्षात्कार, अधूरे सपनों को मिला आकार–प्रकार। खुले नयन तभी ,जब हुआ आत्म–दर्शन, यहीं से प्रारम्भ हुआ नव–जीवन का ‘सृजन’। 'संध्या' ...
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