पितरों को नमन


आप कहीं नहीं गए हो, 

आप यहीं हो, यही कहीं हो।

हमारे पास, हमारे अपनों के आसपास।

भाइयों की आदत में, बहनों की छवि में,

बेटों की बातों में,बेटियों के अहसासों में।

पोते की सूरत में, पोती की हँसी में,

हमारे अनुशासन में,ममता भरी यादों में।

हमारे त्योहारों में, हमारे संस्कारों में।

कुछ रीतियों और रिवाज़ों में,

खान पान,रहन सहन,तौर तरीकों में,

विधि-विधान और नियमों में।

आपकी पसंदीदा घड़ी में,अम्मा के गहनों में,

आपके बहुमूल्य अनुभवों में।

वे धार्मिक पुस्तकें जो आपके हाथों का स्पर्श पाकर मुझ तक आईं,

आपके आशीषों की कोमल छाँव 

मैंने भी पाई।

हमारी भूलों को सदैव क्षमा किया है आपने, 

अपनी शुभेच्छाओ से संवारा है आपने,

इस पितृपक्ष पर पुनः श्रद्धानत हूँ मैं,

सौभाग्य है मेरा कि आपके वंश का

एक हिस्सा हूँ मैं।


-संध्या जैन

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