आभार

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दि.१५.५.२०१६                                   संध्या जैन ,प्र.स्ना.शि.(हिन्दी)


दि. १ फ़रवरी १९९२, केन्द्रीय विद्यालय की छठी कक्षा में मेरा पहला दिन| अरे ...अरे.....आप क्या सोचने लगे ? इतनी बड़ी उम्र में पढ़ाई ........जी नहीं, मैं छात्रा नहीं अध्यापिका बनकर गई थी उस दिन| बैग में ताज़ातरीन नियुक्ति-पत्र, हाथों में अध्यापिका दैनिकी थामे धीरे-धीरे छठी कक्षाओं के दालान तक पहुँची| बाहर कक्षा-पट्टिका पढ़ते-पढते आगे बढ़ती गई, कक्षा छठी ‘अ’.....छठी ‘ब’...... छठी ‘स’......यहीं जाना था मुझे| मन में उमंग व उत्साह का सागर तो हिलोरें ले रहा था परन्तु कक्षा-सागर की आतंरिक गतिविधियों का अंदाज़ा लगाना ज़रा कठिन हो रहा था| ये तो डुबकी लगाने पर ही पता चलेगा न! खैर..थोड़ा सहमते हुए, आत्मविश्वास का ‘टॉनिक’ पीते हुए मैंने छलांग.....क्षमा कीजिए, कक्षा का द्वार खोला और प्रवेश किया| शोरगुल की बागडोर सहसा खिंची और किसी फ़िल्म की रील मानो ‘रिवाइंड’ पर चल पड़ी| फटाफट सब यहाँ-वहाँ से कूदकर, उछलकर, भागकर, गिरते-पड़ते, आनन-फ़ानन में अपनी-अपनी सीमा पर तैनात जवान-से खड़े हो गए और अपने गले की माँसपेशियों की रत्ती भर भी परवाह न करते हुए सस्वर, लय, ताल, आरोह (अवरोह नहीं) के अभिवादन करने लगे| गू ......ड .....मॉ .....र ...नीं .....ग      टी ......च.....र ......| जीवन में अपने वजूद का अहसास यहीं से हुआ| किसी की पुत्री, बहन, पत्नी और दो बच्चों की माँ बनने के बाद चालीस विद्यार्थियों की शिक्षिका बनकर तसल्ली हुई कि इस क्षेत्र में आकर कोई भूल नहीं की बल्कि अपने ऊपर थोड़ा-थोड़ा गर्व करने को मन होने लगा ...क्योंकि उस दिन......
     ‘पहली दफ़ा खुद से मुखातिब हुए थे हम, अपनी चंद खूबियों से वाकिफ़ हुए थे हम|’
  तब से आज तक 24 वर्ष की अनवरत यात्रा के अनुभवों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है| मेरे अधिकारी गण, मेरे सहकर्मी, मेरी सखियाँ और प्रतिवर्ष बदलते विद्यार्थी, जो किसी न किसी रूप में मेरे शिक्षक बनते रहे| सहनशीलता, धैर्य, आपसी तालमेल, क्रोध पर नियंत्रण, बाल मनोवृत्ति  को समझना, अचानक आई समस्याओं से जूझना आदि गुणों को धारण करने का अभ्यास इन सभी के बीच सीखना सरल हो गया जबकि नकारात्मक सोच, बच्चों को मारना, ‘ईगो’, हठ जैसी कठोर भावनाओं पर विजय पाना संभव हो सका| के.वि.संगठन में १९९२ से २०१६ तक नित नए परिवर्तन और प्रयोग हुए हैं और मैं इन परिवर्तनों के साथ हर साल कुछ न कुछ नया सीखती रही| बच्चों ने पीढ़ी दर पीढ़ी मेरे ज्ञान में वृद्धि की है| एन.सी.एफ़., सी.सी.ई., सी.सी.ए., कार्यशाला, ई-कंटेंट, विभिन्न क्रिया-कलापों ने मुझे प्रतिदिन नए दृश्यों-परिदृश्यों से परिचित कराया और मैं भी एक विद्यार्थी बनकर सीखती रही, अपनाती रही| आज, ये ट्रेन, बस, बाज़ार, भीड़भाड़ से बचकर मेरे साथ चलते हुए मेरे घर तक आ गए हैं| अपने उद्गारों को शब्दबद्ध करने बैठी हूँ तो लगा कि ये मेरे दिलो दिमाग में बस चुके हैं| मेरी अनुभूतियाँ मेरी अपनी पूँजी है, इन्हें मैं दिखा तो सकती हूँ दे नहीं सकती| अपने हर सिखाने वाले के प्रति मन में एक ही भाव है -
‘अपनेपन से जब ह्रदय में मुझे स्थान देते हो, अपने में शामिल कर मुझे ख़ास बना देते हो|
      मैं तो बस, इतना ही जानती हूँ कि.., ज्ञान के मंदिर का दर्शन कराने वालों!

मैं आपका ‘आभार’ मानती हूँ’|

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