नवभारत का स्वरूप



नवभारत का स्वरूप

 

नवभारत ने विकास की ओर

‘चंद्रयान’ बढ़ाया था, 

अगस्त 23, वर्ष 23 को 

‛विक्रम' ने पराक्रम दिखाया था। 


चंद्र के दक्षिण ध्रुव पर उतरकर

भारत का तिरंगा लहराया था, 

जहाँ कोई अब तक नहीं पहुँचा

वहाँ भारत का चिन्ह पहुँचाया था।


जिस देश को शून्य समझता था जग

उस ‛शून्य' ने मार्ग दिखाया था, 

‛प्रज्ञान' के ज्ञान से आलोकित होकर,  

 अभूतपूर्व लक्ष्य पाया था। 


भारत की आत्मा जिसमें है

‛वसुधैव कुटुम्बकं' जिसमें है

वह शाश्वत सत्य अमर होकर

‘शिव-शक्ति’ बिंदु कहलाया था।


अंतरिक्ष की ऊँचाइयों को

 अब बढ़ - चढ़कर हम नाप रहे 

‘शुभांशु’ के शुभ चरणों ने 

फिर इतिहास रचाया है।


‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने  ये 

संदेश जगत तक पहुँचाया है 

आतंक नहीं हम सहने वाले 

 ‘महादेव’ ने 'त्रिशूल' उठाया है। 

(तीनों सेनाओं के लिए )


हरित,सौर ऊर्जा,वैक्सीन से 

उत्तम छवि बनाई है

अर्थ व्यवस्था उन्नत होकर 

चौथे स्थान पर आई है।


स्वदेश में बनाएं, स्वदेशी अपनाएं 

भारत आत्मनिर्भर हो जाए 

स्वाधीनता की परिभाषा को

मिलकर सार्थक हम कर जाएँ। 



कितनों ने देखा स्वप्न,

 कितनों ने अपना सर्वस्व दिया, 

कठिन चुनौतियों के आगे 

कभी मस्तक नहीं झुकने दिया,

तब जाकर यह गौरव और  सम्मान पाया है 

 नवभारत ने विकास की ओर

 एक एक कदम बढ़ाया है।


हर नागरिक अपनी संस्कृति 

और देश पर जब गर्व करेगा 

पुरातन नवीन संस्कारों को 

विवेकशील हो ग्रहण करेगा 

तब जाकर सच्चे अर्थों में 

भारत मेरा महान बनेगा 

मानवता का अस्तित्व बचाने 

 फिर से विश्व गुरु बनेगा। 




- संध्या जैन

 पवई,मुम्बई।

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