अंजुरि हरसिंगार की..


अंजुरि हरसिंगार की..

यादों की अंंजुरि कुछ इस से तरह खोलिए,
कि हरसिंगार के फूलों सी  कुछ समेटिये, कुछ बिखेरिये।

जीवन में खिलती उषा हो या सिमटती ‘संध्या’ हो,
भीनी-भीनी अनुभूतियों से खुद को महका लीजिए।

मनपसंद किताब के पन्नों को पलटकर देखिये,
किसी अधूरी कविता को फिर से पढ़ लीजिए।

पुरानी तस्वीरों और ख़तों को खोज निकालिए,
गोदी में रखकर उनको भी प्यार से सहला लीजिए।

 उमंग की पतंग को आसमां छूने दीजिए,
मगर रिश्तों की डोर को हाथों में थामे रखिए।

उम्र दरोदीवार नहीं, तज़ुर्बों का मकान है,
खिड़की से कभी  बचपन को बाहर आने दीजिए।

 दर्पण की धूल को हौले से पोंछ दीजिए
और खुद से खुद की मुलाकात कर लीजिए।
     
                                                                                                                -संध्या जैन

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